IND vs AUS: चेतेश्वर पुजारा के लिए इस बार मुश्किल होगा ऑस्ट्रेलिया में कामयाबी दोहराना | – News in Hindi

टीम इंडिया ने चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara) की शानदार बल्लेबाजी के दम पर 2018-19 में ऑस्ट्रेलियाई ज़मीं (India vs Australia) पर 2-1 से टेस्ट सीरीज जीती थी. पुजारा ने उस सीरीज में तीन शतकों की मदद से 571 रन बनाए थे.

Source: News18Hindi
Last updated on: November 19, 2020, 6:14 PM IST

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राहुल द्रविड़ की असाधारण कामयाबी की चर्चा करने के समय अक्सर लोग इस बात को भूल जाते हैं कि आखिर उस महान बल्लेबाज़ की कामयाबी में अपरोक्ष रूप से सचिन तेंदुलकर का क्या योगदान रहा था. ओपनर के तौर पर गौतम गंभीर की कामयाबी के पीछे भी लोग इस बात का कुछ श्रेय वीरेंद्र सहवाग को देना भूल जाते हैं.

दरअसल, ये कोई नई बात नहीं हैं. क्रिकेट में हमेशा से ऐसा ही होता आ रहा है. विरोधी टीमें हमेशा से ही अपने लिए सबसे ख़तरनाक समझे जाने वाले खिलाड़ियों के लिए ही अपनी रणनीति की सबसे ज़्यादा ऊर्जा खर्च करती हैं. बेहतरीन से बेहतरीन गेंदबाज़ को हमेशा सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी उसी बल्लेबाज़ के लिए दी जाती है जिसके आउट होने से विरोधी टीम के जीत की संभावना पर सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा. और इतिहास गवाह है कि कैसे द्रविड़ और गंभीर जैसे खिलाड़ियों को तेंदुलकर और सहवाग जैसे विरले के साये में खेलने से नुकसान कम फायदे बहुत हुए. मौजूदा टेस्ट टीम में टीम इंडिया के लिए यही लाभ चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara)  को विराट कोहली जैसे दिग्गज के रहने से मिला करता है.

पुजारा को अखरेगी कोहली की कमी
इस बात में शायद ही किसी को संदेह हो कि कोहली का विकेट हर फॉर्मेट में हर टीम के लिए सबसे कीमती विकेट है जिससे लगभग 30 से 50 फीसदी नतीजे कमोबेश तय हो ही जाते हैं. ये कोहली का स्ट्रोक प्ले ही होता है जो पुजारा को अपने अनूठे अंदाज़ में बल्लेबाज़ी बेहद इत्मिनान से करने का मौका देती है. पुजारा अपनी टीम के लिए बिल्कुल एक अलग भूमिका निभाते है जिसमें उनका भारतीय क्रिकेट तो क्या दुनिया की क्रिकेट में कोई जोड़ नहीं है. खुद पूर्व ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज ग्लेन मैक्ग्रा ने हाल ही में पुजारा की तारीफ करते हुए कहा – ‘वह ऐसे बल्लेबाजों में नहीं हैं जो रन नहीं बनने से दबाव में आ जाते हैं. इसी टेम्परामेंट की वजह से पिछले दौरे पर उन्हें मदद मिली थी और उन्होंने काफी रन बनाए थे.’

द्रविड़ जब ऑस्ट्रेलिया में बिजली दो बार नहीं गिरा पाए तो..
दो साल बाद फिर से ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर वैसी ही शानदार कामयाबी को दोहराना पुजारा या किसी भी बल्लेबाज़ के लिए आसान नहीं है. 2018-19 में हुई पिछली सीरीज में पुजारा की शानदार बल्लेबाजी के दम पर टीम इंडिया ने पहली बार ऑस्ट्रेलियाई ज़मीं पर 2-1 से सीरीज जीती थी. पुजारा ने उस सीरीज में तीन शतकों की मदद से 571 रन बनाए थे. पुजारा की कई बार तुलना द्रविड़ से होती है जो एकदम उचित नहीं है.

राहुल द्रविड़ तो ‘सदाबहार दीवार’ वाली भूमिका निभाते थे तो मौजूदा पीढ़ी के लिए पुजारा से ‘बेहतरीन दीवार’ टेस्ट क्रिकेट में भारत के पास नहीं हैं. पुजारा ने हमेशा से ही माना है कि वो द्रविड़ की महानता के करीब पहुंचने को असंभव मानते हैं लेकिन उनके आदर्श हमेशा द्रविड़ ही रहे हैं. अगर ऐसे आदर्श के पद-चिह्नों पर चलते उनकी आधी कामयाबी भी हासिल कर ली जाए तो कोई भी करियर धन्य हो सकता है. इसे महज़ संयोग ही कहा जा सकता है पुजारा के इस बार ऑस्ट्रेलिया दौरे पर अपनी कामयाबी को ना दोहराने के पीछे का तर्क द्रविड़ के करियर की किताब के ऑस्ट्रेलियाई पन्नों से उलटने पर मिल रहा है.

1999 में अपनी पहली ऑस्ट्रेलियाई सीरीज़ में द्रविड़ बुरी तरह से नाकाम (3 टेस्ट में 100 रन भी नहीं बने थे) हुए थे. उसके बाद 2003-04 वाली सीरीज़ में 619 रन बना डाले. द्रविड़, जिनकी छवि हमेशा से नियमित रूप से एक विरोधी विशेष और देश विशेष (इंग्लैंड में हर दौरे पर उन्होंने रन बनाए) में रन बनाने की रही थी वो भी ऑस्ट्रेलिया में 2007-08 और 2011-12 के दो दौरों पर 8 टेस्ट में मिलाकर भी 450 रन नहीं बना पाए. पुजारा ने अपने पहले ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर (2014 में) 201 रन ज़रूर बनाए लेकिन उसे कामयाब दौरा नहीं कहा जा सकता था.

कंगारू बार-बार नहीं बनाने देते ‘एक ही को सरकार’
पिछली बार पुजारा को इस बात का ज़बरदस्त फायदा मिला कि कंगारुओं के निशाने पर कोहली थे क्योंकि 2011 और 2014 के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया में करीब 1000 रन (8 टेस्ट में) बनाने वाले कोहली 2018 में 300 रन का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाए थे. मतलब साफ है कि ऑस्ट्रेलिया द्रविड़ और कोहली जैसे दिग्गजों को भी अपनी ज़मीं पर कामयाबी को दोहराने के मौके कम ही देता है और ऐसे में पुजारा के लिए दूसरे छोर पर अपने कप्तान का साथ सिर्फ 1 मैच में ही मिले तो ये कहा जा सकता है कि इस बार दबाव सौराष्ट्र के इस बल्लेबाज़ पर होगा.

कोहली नहीं, अब पुजारा हैं निशाने पर
यह पहला मौका होगा कि जब कोहली की ग़ैर-मौजूदगी में टेस्ट सीरीज़ जिताने की ज़िम्मेदारी गेंदबाज़ों के साथ-साथ पुजारा के कंधों पर भी होगी. सीरीज़ शुरू होने से पहले मैक्ग्रा अपने ज़माने में विरोधी टीम और उसके अहम खिलाड़ियों पर निशाना साधते थे. रिटायर होने के बावजूद मैक्ग्रा ने मैदान के बाहर से बाउंसर डालने की कला अब तक बंद नहीं की है और यही वजह है कि इस पूर्व ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज ने कहा- ‘पिछली बार हालात पुजारा के पक्ष में थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. वह लंबे वक्त से क्रिकेट से दूर हैं और उन्होंने क्रीज पर ज्यादा वक्त नहीं बिताया है. ऐसे में इस बार उन्हें रन बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.’

पुजारा का करियर भी कुछ कहता है..
पुजारा के 77 टेस्ट के करियर पर नज़र दौड़ाएं तो ये साफ होगा कि उप-महाद्वीप के बाहर करीब 75 का टेस्ट सीरीज़ में औसत उन्होंने सिर्फ 1 मौके यानी की पिछले ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर ही हासिल किया था. इसके अलावा विदेशी ज़मीं पर उनकी इकलौती कामयाब टेस्ट सीरीज़ साउथ अफ्रीका में 2013 का दौरा था जहां पर 2 टेस्ट के दौरान उनका औसत 70 के करीब था. ये आंकड़े कहीं ना कहीं इस बात को दर्शाते हैं कि पुजारा के लिए अपने ही खेल को विदेशी ज़मीं पर दोहराना कितनी कड़ी चुनौती रही है. ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई ज़मीं पर अपने जीवन की सबसे यादगार सीरीज़ को दोबारा उससे मुश्किल हालात और बेहतर गेंदबाज़ी आक्रमण के ख़िलाफ दोहराना किसी चमत्कार से कम ना होगा. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)


ब्लॉगर के बारे में

विमल कुमार

न्यूज़18 इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार करीब 2 दशक से खेल पत्रकारिता में हैं. Social media(Twitter,Facebook,Instagram) पर @Vimalwa के तौर पर सक्रिय रहने वाले विमल 4 क्रिकेट वर्ल्ड कप और रियो ओलंपिक्स भी कवर कर चुके हैं.

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First published: November 19, 2020, 5:42 PM IST



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